देह का सुख


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देह का सुख
कितनी बड़ी चीज है जिसमें
त्याग देता
एक कामी पुरुष अपने
माता-पिता, भाई बहनों और
अपने संपूर्ण परिवार को
सारी उम्र बनकर रहता
उस औरत का गुलाम
एक तिनका भी जो कभी
तोड़ती नहीं
बस एक पहला और
आखिरी काम
एक सांस भी बिना भरे
बस घोलने रहना
घरवालों के खिलाफ
कानों में जहर बेहिसाब, लगातार और तमाम
बाल भी बांका नहीं होता कभी
ऐसी त्रिया चरित्र औरतों का
इज्जत पाती हैं पति,
बच्चों और समाज से
सो अलग
आज समाज कौन सी दिशा में
जा रहा है
जिनका होना चाहिए सम्मान
उन्हें दुत्कार रहा है और
जो नहीं एक पैसे की
इज्जत के भी लायक
उन्हें आसमान के
चांद के सिंहासन पर
सुशोभित कर अनगिनत
सम्मानों से विभूषित कर रहा है
अफसोस होता है
बेहद अफसोस
यह नाटक सच में बेहद
फूहड़ और हास्यास्पद है लेकिन
इसे देखने और सराहने के लिए
दर्शकों की कमी नहीं है।


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