दीवार पर टंगा कैलेंडर


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साल बदलता है
दीवार पर टंगा कैलेंडर भी बदल जाता है उस पर अंकित
महीने वही,
हफ्ते वही,
दिन वही,
तारीखें वही,
मौसम वही,
बस उसका रूप बदल जाता है
रंग बदल जाता है
आकार प्रकार बदल जाता है
अंदाज बदल जाता है
उसको स्थापित करने का स्थान बदल जाता है
हर साल बीतने पर
मैं पुरानी होती चली जाती हूं
यह हर साल आता है
नये परिधान पहनकर
सज संवरकर
एक दूल्हे सा होकर घोड़े पर सवार गुजरते समय के अहसास को लेकर
इसे कभी कोई चिंता नहीं सताती
मेरी आंख है कि इस पर
लिखी तारीख पर अटक जाती है
गुजरे वक्त में जो लोग, जो मंजर,
जो लम्हे साथ थे
उन्हें कहीं नहीं पाती है
कैलेंडर को मेरे दिल के
अहसासों से कहां होता है कभी
कोई वास्ता
आखिरकार यह है तो
महज एक कागज का टुकड़ा ही
लेकिन फिर भी
जीवन में इसके बिना
कोई कार्य
योजनाबद्ध तरीके से संभव होना मुमकिन नहीं।


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