तुम्हारे नयनों के दर्पण में


0

मैंनै जब तोड़ा
अपने अहंकार का दर्पण
तब कहीं जाकर दिखा
तुम्हारे नयनों के दर्पण में
मुझे अपना फूल सा मुस्कुराता चेहरा
एक लंबे अरसे बाद
क्रोधित होकर
हम उम्र भर न जाने
घर में सजे कितने ही दर्पण
तोड़ते रहते हैं लेकिन
ऐसा करने से
हमारे हाथ कुछ आता नहीं
हम खुद को ही कहीं बड़ा भारी
नुकसान पहुंचाते रहते हैं
खुद को ही कहीं भीतर से
खाली करते रहते हैं
अपनी सुंदरता को भी भरी पूरी
जवानी में खोते रहते हैं
कुछ तोड़ना ही है तो
दर्पण तोड़ो
अहंकार के
हीन भावना के
जिद के
चालाकी के
बेईमानी के
साजिशों के
झूठ के
बेअदबी के
बुरे व्यवहार के
कटु वाणी के
गंदे दूषित घिनौने विचारों व विकारों के कीचड़ भरे
दुर्गन्ध भरे
कांटों भरे
पथरीली राहों भरे
ईर्ष्या की चिंगारियों भरे।


Like it? Share with your friends!

0

0 Comments

Choose A Format
Story
Formatted Text with Embeds and Visuals