दुनिया की भीड़ में
मैं खो जाती हूं
तन्हाई में पर
खुद को पा लेती हूं
यह लोगों का रेला
तुम्हें सांत्वना न दे तो फिर
किसी काम का नहीं
आवाजों के बेमतलब शोर से फिर
बेहतर है खामोशी
दिल बहलाने के लिए
दर्पण से बाहर झांकता
खुद का अक्स काफी है या
अपनी ही कोई तस्वीर या
इस कुदरत की रंगीन तो
कभी श्वेत श्याम या
कभी धुंधली से पड़ती एक लकीर।
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