तैर रहे हो
एक छोटी मछली से तुम
अभी तो एक विशाल समुन्दर के पानी की लहरों पर
एक विस्तृत नीले आसमान के नीचे
तुम्हारे जल का रंग और
आसमान के मन के धरातल का रंग 'नीला'
एक दूसरे से कितना मिलता है
जहाज का रंग 'सफेद' मेल खा रहा आकाश के श्वेत बादलों से
जहाज की और मेरी परछाइयां निरंतर बन रही
जल की उठती गिरती लहरों में
मैं कभी देखता आसमान को तो
कभी समुन्दर को और
यहां देखने को है भी क्या
जहाज किनारे तक पहुंच पाने में हो जायेगा सफल या कहीं बीच रास्ते कोई अनहोनी तो घटित नहीं हो जायेगी तन्हाई में ऐसी आशंका का मन में उठना स्वाभाविक है
किनारे पर जब हम सुरक्षित पहुंच
जाते हैं तो कभी
उसका महत्व समझते हुए
भगवान को धन्यवाद नहीं कहते
कभी किसी एक भंवर ने भी जो
कर दिया जीवन को तहस-नहस तो
फिर समझ आता है कि
जिंदगी का एक सामान्य गति से
चलते रहना भी अपने आप में
कितना महत्वपूर्ण होता है जिसे
हम समय रहते कभी समझ नहीं पाते अधिकतर इसे अनदेखा करते हैं
नकारते हैं और
दुत्कारते हैं।
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