चाँद के पार: सुलक्षणा मिश्रा द्वारा रचित कविता


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मेरी असीमित कल्पनाओं को
मिलता जब एक अल्प विराम।
उसके बाद होता शुरू मेरी कल्पनाओं का
एक नया अवर्णित संसार चांद के पार।
मेरे बचपन की कहानियों में वर्णित
वो रूई कातती एक बूढ़ी सी औरत होगी यकीनन वहां।
हर शायर के ख्वाबो खयालों में उकेरी
वो कल्पनाओं में सजी महबूबा भी मिलेगी वहां।
चांद के पार होगा यकीनन एक खूबसूरत जहां
होगी पसरी चांदी सी शीतल चांदनी यहां से वहां।
मिल जाती होगी जिस से रूह को स्थिरता
चांद के पार के उस जहां में
पसरी रहती होगी ऐसी भीनी सी शीतलता।
चांद के पार की क्या ही बात होगी
ख्वाबों में बसने वाली महबूबा भी साथ होगी।
मन को भीतर तक भिगो देने वाली
जादुई चांदनी की भी अनवरत बरसात होगी।
चांद के पार होंगे सितारे भी साथ में
यूं ही चांदनी न अकेली होगी पूनम की रात में।
चांद के पार होंगे सब साथ में।

 


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