घर में कदम रखते ही


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अपने घर के

कमरे में बंद रहती हूं तो

लगता है कि

जैसे मैंने इस दुनिया की सारी खुशियां पा ली

घर के बाहर जो निकली

दिखी जो फिर दुनिया की भीड़

पाया उनके बीच जो खुद को अकेला

मन हो जाता है भीतर की

गहराइयों तक बहुत दुखी और

गंभीरता के बादलों से

खुद को सिर से पांव तक ढक लेता है 

दिखती है कहीं जो दुनिया की सच्चाई

उसका क्रूर चेहरा

लोगों का अमानवीय व्यवहार तो

दिल कांप उठता है

सिहर जाता है

भविष्य को लेकर चिंतित हो

जाता है

फिर घर में कदम रखते ही

अपने कमरे

अपनी कुर्सी

अपने बिस्तर तक पहुंचकर

उसके तकिये पर अपना सिर रखकर

लेटकर जो देखा

उसे एक बुरे सपने की तरह भुलाकर 

फिर भविष्य के ताने बाने

सुनहरे धागों से बुनने लगता है।


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