जिंदगी में
ऐसा समय भी आता है कि
अधिकतर लोग
आपको कम मूल्य की कोई सस्ती वस्तु सा
समझने लगते हैं और
उनका व्यवहार दिन प्रतिदिन आपके प्रति बद से बदतर
होता चला जाता है
शायद ही कोई दिन जाता हो जब
आप कहीं न कहीं से
कोई न कोई कठोर प्रहार नहीं झेल रहे होते
न चाहते हुए भी अपमान के
घूंट पीने ही पड़ते हैं
हमले आत्मघाती भी होते हैं
कभी तन, कभी मन
कभी दिल, कभी आत्मा को
यह तोड़कर रख देते हैं
जब सिर से पानी गुजरता है तो
कोई कितना भी शांत स्वभाव का हो
उसे गुस्सा आना लाजमी है
कोशिश तो भरसक करनी चाहिए कि ऐसी विपरीत परिस्थितियां पैदा ही
न हो लेकिन
इसका नियंत्रण किसी एक के हाथ में पूरी तौर से नहीं होता
दूसरा भी ऐसी विषम
परिस्थितियों को उत्पन्न करने के लिए जिम्मेदार होता है
क्रोध तो आयेगा जब जुल्म
अपनी अति पार कर जायेगा
ऐसे में भी खुद पर संयम बरतने में ही समझदारी है
झगड़े वाले स्थान से तत्काल हटना
एक समझदारी भरा निर्णय होता है
बहस के दलदल से भी खुद को
बाहर निकालें
गुस्सा बाहर निकालें लेकिन
जिस पर निकालना है
उस पर न निकालकर
अकेले में कहीं भी,
कैसे भी चाहे
खुद की शक्ल को दर्पण में
देखते हुए खुद पर ही
गुस्से के गुबार को बाहर निकाल
ही देना चाहिए
किसी से बचते हुए
हर कहीं कम उलझते हुए और
खुद के हित का भी ख्याल
करते हुए।
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