कागज-कलम और
साथ में मैं भी
मेरे बिना कैसे हो
इन दोनों का सफर पूरा
मेरे बिना
इन दोनों का प्यार रहेगा अधूरा
मैं हूं इन दोनों को जोड़ने का
एक माध्यम
कागज की देह को
कलम की अंगुलियों से
सहलाती हूं
कभी उसे खाली अपने हाल पर
छोड़ देती हूं तो
कभी उसे अपनी मुस्कुराहट,
अपने आंसुओं,
अपनी रूहानी कहानियों से
पूरा भर देती हूं
उसका कोई कोना नहीं छोड़ती
फिर खाली,
तन्हा,
अकेला,
मायूस,
परेशान
मैं इन दोनों के बीच
एक सेतु सी न बनूं तो
इन दो किनारों को मिलवाये
कौन
मेरे बिना
रह जायेगा यह कागज
कोरा और अधूरा सा ही
कलम रह जायेगी
स्याही से भरी
पूरी पर तन्हा सी ही
कलम चलेगी जब कागज पे
तब ही
कोई प्रेम कहानी पूरी होगी
जाने अंजाने में।
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