कल जो भोर हो


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आज तो

सवेरा हुआ ही नहीं

सूरज जो नहीं उगा

दिन भर सर्द मौसम का असर

रहा

कोहरे की एक चादर

आसमान में फैली रही

घर के भीतर तो

अंधेरा सा ही भरा रहा

दिन भर हाथ पांव

सबके ठिठुरते रहे

बदन गर्म कपड़ों से ढका था

पर दिल को एक गीलेपन का

अहसास हुआ

आसमान आज न

चमकीला था

न रंगीला था

न ही सुनहरा था

यह तो एक दिलजला सा

लग रहा हर तरफ से

मटमैला था

आज परिंदे भी

आसमान में उड़ने से

कतरा रहे थे

अपने ही पंखों के आगोश में

सिमटकर अपने जिस्म के गोश्त की गर्मी को

पा रहे थे

न पतंग

न हवाई जहाज

कुछ भी तो इस गीले आसमान में नहीं था

हर कोई इसी इंतजार में था कि

कब यह कोहरा छंटे

ठंड थोड़ी तो घटे

रात घर के भीतर ही

रजाई लपेटकर

उसमें सिकुड़ी सिकुड़ी  

जैसे तैसे गुजर जाये

अगली सुबह हो तो

सूरज उग आये

हल्का सही पर अपनी तपिश से

सबको थोड़ा तो गरमाये

कल जो भोर हो तो

एक गरम सूरज अवश्य संग हो

सर्द मौसम का हो

इसे ख्याल

यह हो पाये तो फिर

कोई इसकी अनुपस्थिति से न

तंग हो।


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