ओ मेरी रूह
तुम मेरे जिस्म के लिबास के भीतर
कहां छुपी रहती हो
हर बात पर तड़पती हो
बिलखती हो
एक छोटे नादान बच्चे की तरह रोती हो
ऐसा लगता है मुझे कि
तुम एक रेगिस्तान के जैसी ही
अकेली पड़ गई हो
तुम भटकती हुई
इधर से उधर
एक बवंडर के अनगिनत घेरों की
तरह चारों ओर घूम रही हो
ठहर जाओ
रुक जाओ
स्थिर हो जाओ
खुद को पकड़ो
खुद को साधो
खुद को समझाओ
खुद को मनाओ
इस दुनिया में तुम्हारे दिल की
कोई नहीं सुनेगा
अपना सुख दुख अपने साथ ही
बांटो
अपनी दोस्त खुद बन जाओ
हमसफर
हमराही
सब कुछ
रेगिस्तान सी इस वीरान जिंदगी को
तपती दोपहरी में नहीं
रात के अंधेरों में
चांद की रोशनी के तले नापो
अपनी परछाइयां खुद पर भी
पड़ने मत दो
तन्हा है यह जिंदगी का सफर
तन्हा हो तुम
यह लंबा और मुश्किल सफर
तुम अकेले
अपने दम पर
मुस्कुराते हुए काटो।
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