ऐ फूल
सुनो तुम आज जरा
गौर से
मेरे दिल की कहानी
कहने को तो मेरी तरह से
वही पुरानी
लेकिन जब कभी उसे सुनाऊं मैं
बार-बार जो दोहराऊं मैं
कानों में तुम्हारे आकर
एक गीत सा जो उसे गुनगुनाऊं मैं तो
लगे बहुत ही सुहानी
तुम मेरे करीब आ जाओ
जरा कुछ और नजदीक
तुम्हारी महक आज मैं उतार लूं
अपनी सांसों में और
उन्हें महका लूं एक इत्र सा
बहकी बहकी मैं जाऊं
झूमती चली जाऊं
बिन पिये ही
आज मस्ती भरी
फूलों से लदी इन वादियों में।
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