एक सूखा गुलाब
कभी एक खिला हुआ गुलाब था
किसी गुलशन की बहार था
एक आशिक का ख्वाब था
एक महबूबा के साजो सज्जा का सामान था
दिल से दिल तक जाते हुए रास्तों की पहचान था
एक महकती हुई इत्र की दुकान था
एक आसमान का मेहताब था
तितली, भंवरा, चिड़िया,
माली, राहगीर आदि
हर कोई तो आकर्षित होता था उसकी ओर
ऐसा कौन था जो उस पर
मोहित नहीं होता था
उस पर दिलो जान से फिदा
नहीं होता था
उम्र खत्म होने पर जो वह
सूखा तो
फिर कैद हो गया
किसी किताब के पन्नों के बीच
या
हो गया दफन उस मिट्टी में
जहां वह अपने अंतिम क्षण में
टूट कर गिरा था
या
बहती हुई जल धाराओं के साथ ही
कहीं सुदूर देश बहकर चला गया
यह गुलाब जो सूखा तो
एक याद का प्रतिबिंब बन गया
जिसके स्मरण मात्र से
हवाओं के संग उसकी
ताजी महक उसके न होने पर भी
उसके होने का आभास देती हुई
सांसों में रच बस व घुल जाती है।
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