यह बंधन सच्चा है
पवित्र है
अटूट है
कहीं से कच्चा नहीं
अपरिपक्व नहीं
मटमैला नहीं
एक बिना बादलों के आसमान में
एक श्वेत पुष्प की तरह
शत प्रतिशत स्वच्छता व स्वच्छंदता से
खिला हुआ है
गंगा की निर्मल जलधारा से भी
शायद सौ कदम आगे
एक चांदनी की शीतलता को
मन के भीतर
कहीं स्थाई रूप से भरता हुआ
दूर दूर तक
जेहन में इस रिश्ते को लेकर
कोई चिंता की लकीर नहीं उभरती
कोई दुविधा नहीं
कोई शंका नहीं
कहीं कोई विघ्न नहीं
कोई संबंध हो तो
एक दर्पण में झांकती अपनी छवि सा अन्यथा क्या करे
कोई खुद के अस्तित्व या
दर्पण में निहारते अपने
रूप का।
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