एक मां समान


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न मैं मैं रहा

न तू तू रहा

हम दोनों खो गये

कहीं प्रकृति की इन हरी भरी वादियों में

स्तब्ध हैं यह मन की आंखें

इनकी सुंदरता को निहार कर

आसमान को छूते पहाड़ तो

कहीं पेड़ की डालियों पर झूलते हरे पत्ते और

पौधों पर फूलों की बहार

यह सब हमारे शिक्षक कितना कुछ

सीखा रहे हमें

पर्वत मौन हैं

आसमान रंगीन

धरा की गोद हरी है

इसकी घनेरी पलकों तले

कोई भी सो सकता

इसके कंधे पर धरकर अपना सिर

चैन की नींद

रुक जाये यहीं

बस जाये यहीं कहीं

बना ले अपना एक स्थाई

निवास स्थान

इन घाटियों के हृदय स्थल में ही

कहीं

हमें यह हरदम अपनायेंगी

न कभी बुरा समय हमारा देख

कहीं ठुकरायेंगी

हमेशा ही अपनी छाती से

चिपकायेंगी

एक मां समान अपने

नवजात शिशु सी हमें।


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