मैं
एक गीत गाता हूं जो
मैंने लिखा दिल की कलम से
मैं
एक साज बजाता हूं जो
मिला हुबहू मेरी धड़कनों के सुरों से
मैं
संगीत की महफिल जब कभी
सजाता हूं तो
खुद को भूल जाता हूं
अपने आसपास के माहौल से
आहिस्ता आहिस्ता
दूर होता हुआ किसी दूसरी
एक अलग गाती, थिरकती,
मस्ती लुटाती दुनिया में चला जाता हूं
मैं तुम्हें तुमसे दूर होकर भी तब पा
लेता हूं
अपने बेहद करीब लाकर तुम्हें
गले से लगा लेता हूं
तुम्हारे नरम गुलाबी लबों को
चूम लेता हूं
तुम्हें तुम्हारी पसंद का
एक प्रेम गीत सुनाता हूं
सच मानो
मैं तुम्हें किसी इंसान सा नहीं
उस पल एक खुदा सा ही पाता हूं।
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