तेरे गालों पे
क्या गुलाल मलूं
वह तो पहले से ही गुलाबी हैं
बेशुमार गुलाबों की रंगत लिए
उन्हें और क्या गुलाबी करूं
होली का दिन है
उड़ रहा गुलाल चारों तरफ
तेरी ओर भी उड़ कर जा रहा
तेरी काया पर एक गुलाबी रंग जो बरसा रहा
इस गुलाबों के गुलिस्तान में विचरती फूलों की मल्लिका को कैसे न मैं सजदा करूं
एक गुलाबी मोहब्बत की लहर
हो सके तो वह मेरी तरफ भी लहरा दे
मेरे दिल में उतरते अहसासों को वह जो समझ जाये तो
गुलाल में नहाई फिजाओं को
क्यों न मैं अपने आगोश में भरूं।
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