रिश्तों की डोर से
मन बंधा तो है लेकिन
कोई उम्मीद कभी इनसे करी तो तत्काल प्रभाव से
अपना असली रंग दिखा जाते हैं उम्मीदों पर कभी खरे नहीं उतरते
जो मन सोचे
वह हकीकत में कभी नहीं होता
जो आंख सपने संजोये
वह कभी पूरे होते नहीं दिखे
चारों तरफ एक कांच का घेरा है
खुद में ही कहीं सिमटते रहना है
जरा सा अपना दायरा जो बढ़ाया और गलती से उनकी सतह को जो छुआ तो इसका अंजाम एक शूल की नुकीली नोंक से चुभते दर्द सा ही होगा
जो हमेशा दिल को तड़पायेगा
उसे कभी प्यार से सहलायेगा नहीं
कोई झूठी आस भी बंधायेगा नहीं।
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