किताब खोली
बिना कुछ पढ़े
बंद कर दी
उसमें बरसों से कैद थी
एक कशमकश की तितली
उसे भी खुले आकाश में
उड़ा दिया
उसे स्वतंत्र कर दिया
ऐसा करने से
सच मानिये
मैं भी कहीं गहराई से
आजाद हो गई
हमेशा के लिए
इस बार जो किताब खोलूंगी तो
दिलो जान से इसके हर अक्षर को
पढ़ूंगी और समझूंगी
इस बार किसी जान की मुझे
चिंता न होगी
मेरा मन शांत होगा
उसमें कोई उथल-पुथल नहीं होगी
जिज्ञासा होगी कुछ नया
जानने और सीखने की लेकिन
बिना संशय।
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