प्रेम क्या है
मैं तुमसे पूछती हूं
ढाई आखर का यह शब्द लेकिन
इसकी व्याख्या कितनी मुश्किल
इस सवाल का जवाब मैं ही नहीं
ढूंढ पाई आज तक तो
तुम इस पहेली को कैसे सुलझा
पाओगे
मैं तुम्हारा नाम पुकारती हूं और
मेरी आवाज पहाड़ों से टकराकर
एक गूंज बनकर
तुम्हारे ही नाम की
मुझ तक लौट आती है
मेरे गले से ही जो स्वर फूटे थे
उनकी झंकार वापस कहीं
मेरे दिल में उतर जाती है
मेरी आत्मा के अक्स में
समा जाती है
मैं तुम हूं
तुम मैं हूं
हम दोनों एक ही तो हैं
कितना रहस्यमयी है
इस प्रेम के संसार में सब कुछ
बस फिलहाल तो इतना
समझना काफी है कि
इस समय के बिंदु पर
हम दोनों साथ-साथ हैं।
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