मेरे शहर के पास
एक गांव है
वह है छोटा तो
उसकी सड़कें भी हैं छोटी
कच्ची मिट्टी की पगडंडियों सी
कम चौड़ी
एक सकरी गली सी लेकिन
इन पर चलो तो मन को
कितनी शांति मिलती है
धरती पर
एक जन्नत का अहसास होता है
कहीं कोई बेमतलब का शोर
शराबा नहीं
बस ठंडी शीतल हवाओं की सरसराहट परिंदों की चहचहाहट
सूरज की किरणों के दूर तक
फैले सुनहरी जाल
चारों दिशाओं में
अपनी लंबी टांगे फैलाये पसरी
खामोशी
फूलों के गीतों की गुनगुनाहट
पत्तियों की कलियों की तरह चटकती हुई सी एक आहट
मेरे भीतर भी फूटता है
फिर एक झरना आध्यात्म का
जो इस गांव की सड़क से ही
ले जाता है
मुझे इस दुनिया के परे कहीं।
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