नया साल है
नया दिन
नया सूरज
नई आकाश छूती उमंगें
इन बच्चों से ही क्यों न बन जायें हम
उड़ जायें हवाओं संग
कभी परिंदे तो
कभी रंग बिरंगे गुब्बारे बनकर
फैलाकर कभी अपने पंख
उम्मीदों के एक चिड़िया से
आकाश की ओर उड़ चलें
बीच राह जो कभी थक जायें तो
उतर आयें आहिस्ता आहिस्ता
पल दो पल सुस्ताने के लिए
किसी पेड़ की डाल पर या
छत की किसी मुंडेर पर या
धूप की किरणों से पटे किसी
हरे भरे मैदान पर।
0 Comments