अपनी सी ही शक्ति


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देवी मां!

तुम शक्ति की एक प्रतीक हो

मैं तुम्हारी संतान

फिर क्यों मैं कभी-कभी

खुद को महसूस करती शक्ति विहीन

मां तुम्हारे सानिध्य में तो रहती मैं

हर समय

तुम्हारी स्तुति करती मैं हर क्षण

तुम्हारी भक्ति में लीन रहती मैं हर पल

तुम्हारे पदचिन्हों का अनुसरण करती 

तुम्हारे बताये मार्ग पर चलती

फिर क्या हुई मुझसे भूल

जिसकी सजा मैं काट रही

फूलों की शैया चुभ रही मुझे शूल सी

जिंदगी की भोर लग रही एक

आंधी धूल भरी

मां मुझे इन कष्टों से मुक्ति दे

मेरी मनोस्थिति बदल दे

मुझे भी अपनी सी ही शक्ति

का कुछ अंश दे

मेरी झोली भर दे

मेरी मुराद पूरी कर दे

मुझे खाली हाथ अपने दरबार से

मत लौटा मां

मेरी शिराओं में शक्ति का

नव संचार कर दे।


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