अपना देश


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अपना देश

अपने देश की मिट्टी

अपने देश की हरियाली

अपने देश के वासी

अपने देश की निराली छटा

बनावट, सजावट

अपना देश कण कण में

अपना देश सम्पूर्णता में

आखिर कौन होगा ऐसा जिसे

मन से नहीं भायेगा

अपने देश का

भारतवर्ष महान का

मैं किन शब्दों में वर्णन करूं

कहां से लाऊं वह शीश

जिसे इसके चरणों में नमन करूं

कहां से लाऊं उन

खुशियों की

आभार प्रकट करती माला

जिससे इसका वंदन

करूं

कहां से लाऊं

करुणा की एक अश्रु धारा

जिससे इसके करकमलों का

स्नान करूं

मैं तो अपनी धरती मां की

गोद में पलती हूं

इसकी धरा पर चलती हूं

इसकी खुली हवाओं में सांस लेती हूं

यह मुझे भोजन देती है

जल देती है

आश्रय देती है

सब कुछ तो इसी धरा का दिया है

मेरा खुद का क्या है

अपने देश की मिट्टी से ही

मुझे तो जीवन भर खेलना है और

इसी में अपने जीवन के

अंतिम क्षण में मिल जाना है

मेरा देश मुझे तो बहुत प्रिय

और आदरणीय है

इसे छोड़कर मुझे तो कहीं

अन्य स्थान पर नहीं जाना है।


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