अंधेरी रात और
गहरा गई
पहले से अंधकारमय थी
और अधिक हो गई
जब डाल दिया मैंने पर्दा
अपने कमरे की बंद खिड़की पर
कमरे में अंधेरा
न कहीं उजाला
चांद भी छिपा बादलों की
ओट में
आकाश भी श्यामवर्ण सा
काला
पर्दे का कपड़ा भी
मोटा
नहीं कहीं से झीना
रोशनी की किरण कहां से
आये
हर तरफ अंधकार का बसेरा
बाहरी आवरण
अंधकार युक्त
मन में मेरे फिर भी
भरा उजियारा
अंधकार में भी मुझे
दिख रहा था प्रकाश
वह था उज्जवल श्वेत
चमकीला
नहीं था कहीं से लेशमात्र
भी काला।
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