अंत में स्पर्श करती हूं मैं


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एक पेड़ पर लगे फूल को

मैं कभी तोड़ती नहीं

मैं इस महापाप समझती हूं

एक वध समान है यह

किसी का जीवन चक्र 

एक प्राकृतिक तरीके से 

समाप्त होने से पहले जैसे 

किसी को अपनी अंगुलियों के नाखूनों जैसे 

नुकीली चाकू सी धार से 

किसी का कत्ल करना

दूर से ही उसे निहार लेती हूं और

उसकी सुगंध को सूंघकर 

अपने भीतर अपनी सुगंधित श्वासों के संग ही भर लेती हूं

उस पेड़ पर ही लगे फल

जो अब उसकी डाल से टूटकर जमीन पर नीचे गिरा पड़ा है

उसे प्रेम पूर्वक उठाकर

अपने हृदय से लगाकर

स्वच्छ जल से धोकर

उसकी कोमल देह पर

अपने मोती से चमकते दांतों से चख मारकर

उसका रसीला स्वाद चख लेती हूं

मैं पेड़ की सुंदरता को

निहारती हूं

उसके हरे घनेरे पत्तों के पीछे छिपी बैठी हुई 

किसी कोयल की दर्द भरी कूक

जो मेरे दिल में उठाती है

एक प्रेम विरह की हूक को

अपने कानों से सुन लेती हूं

अंत में स्पर्श करती हूं मैं

अपने हाथों से पेड़ के तने को

और उसके अनगिनत अंगों को

अपने पैरों से धरती पर खड़ी हूं तो

उससे भी कहीं गहरी बंधी हूं

अपनी आत्मा के किसी कोने

को भी एक चिड़िया के परों सा

कोमल स्पर्श देती हूं और

उसे झंकृत भी करती हूं

एक पायल की झंकारों सा।


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