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लहराते वो खेत: ऋषिका श्रीवास्तव द्वारा रचित कविता

जहाँ की मिट्टी से पलता है तेरे शहर का पेट…
कभी आकर देखना गाँव के लहराते वो खेत….!

मिट्टी के मिठास को शोख, जिद्द की जमीन पे उगी…
इच्छाओं के ईख से जन्मी, मेहनत की वो लेख….
जहाँ की मिट्टी से पलता है तेरे शहर का पेट…
कभी आकर देखना गाँव के लहराते वो खेत….!

पानीदार कुओं पर चलते, रहटों की आवाज़ जहाँ….
धानी- धरती के कण-कण को, धोरों की सौगात जहाँ….
हरियाली ले फ़सल खड़ी है,खुशहाली के गीत जहाँ…
जहाँ की मिट्टी से पलता है तेरे शहर का पेट….
कभी आकर देखना गाँव के लहराते वो खेत….!

तेज धूप में बहा पसीना, परिश्रम का है लोहा जहाँ….
खुद को धूप में जलाकर, गर्मी की बेपरवाह करके..,,
गमछा सिर पे रखकर, सुखी सी बंजर जमीन को उपजाऊ बनाते है…
वो अन्नदाता किसान भाई हमारे पेट को भरते यहाँ….
जहाँ की मिट्टी से पलता है तेरे शहर का पेट….
कभी आकर देखना गाँव के लहराते वो खेत…!!