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प्रेम हो एक अमृत समान

प्रेम अपनी तरफ

आकर्षित करता है लेकिन

एक लंबे समय तक या

आजीवन या

जीवन की आखिरी सांस तक

वह बना रहे

इसके लिए उसका सच्चा होना

एक अति आवश्यक और

अनिवार्य अंग है

प्रेम में भी सच्चाई निहित होनी

चाहिए

एक प्रकृति की ही सुंदरता सी जो

कभी जीवन के समाप्त होने पर भी निरंतर एक सांसों की लय सी ही

चलती रहे

सूरज जब अस्त होता है तब भी

अपनी छटा बिखेरे रखता है

आसमान की चारों दिशाओं और

हर छोर में

अपना अस्तित्व नहीं खोता

प्रेम को भी ऐसा ही होना चाहिए

मर कर भी

किसी में अमरत्व को प्राप्त करने की शक्ति होनी चाहिए

प्रेम में स्वाभिमान होना चाहिए

आत्मसम्मान होना चाहिए

एक दूसरे के प्रति समर्पण होना

चाहिए

तन की सुंदरता से नहीं

अपितु मन की सुंदरता का

महत्व होना चाहिए

प्रेम के भाव में एक आत्मिक

संतोष झलकना चाहिए

प्रेम एक अमृत के समान होना

चाहिए

प्रेम की कली जब चटके तब

इसे एक प्रेम का वृक्ष बनना

चाहिए

प्रेम के फूलों को हमेशा ही

खिलाते हुए

प्रेम के उपवन को महकाते हुए

प्रेम को हृदय में एक स्थायित्व स्थान

प्रदान करते हुए

एक पेड़ की जड़ों सी ही मजबूती

देते हुए

सदा प्रेम के फलों का

उपहार प्रदान करते हुए।