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दुनिया की भीड़ में भी तन्हाई है

मेरा मन

आजकल

कुछ परेशान रहने लगा है

कारण साफ है कि

अपनों का साथ जो

मेरे हाथ से छूट चुका है

मेरे अंदर से आवाज आई कि

अपने स्थान से

अपने घर से

अपने कमरे से

कहीं बाहर निकलो

किसी भीड़ वाली जगह पर चलो

जहां हलचल हो

शायद यह छोटा सा निर्णय

कहीं मेरे दिल को खुश कर दे और

मेरा अन्तर्मन एक बड़ा बदलाव महसूस करे

मैंने मानसिक रूप से

खुद को तैयार किया और

थोड़ा सा सज संवरकर

घर के समीप ही

एक बाजार में पहुंच गई

बाजार में भीड़ इतनी अधिक थी कि

कहीं पांव रखने की जगह नहीं थी

शाम का समय था

आसमान पर काले बादलों का साया था

दुकानों में सजावट थी

सड़क पर और उसके चारों तरफ

रोशनियों की झिलमिलाहट थी

मैं कभी इधर देखती

कभी उधर देखती

बीच बीच में यह भी चाहती कि

कोई मेरी तरफ देखे और

अजनबी सही पर

मुझसे बात करे

मेरे दिल का हाल पूछे लेकिन

मैंने देखा कि

इतनी भीड़ में भी तन्हाई है

हर किसी की अपनी दुनिया है और

हर कोई खुद में मसरूफ  

दूसरे की फिक्र कोई पल भर को भी

क्यों करे

इतना समय ही कहां है इन

व्यस्त लोगों के पास

इनके जीवन की न जाने कौन सी

परिभाषायें हैं

क्या इनके जीने के तौर तरीके हैं

क्या इनकी सुविधायें,

दुविधायें या व्यवस्थायें हैं

एक आंख ऐसी नहीं थी जो

किसी के दिल की किताब पढ़ने के लिए

उठती हो

इस भीड़ के लिए

बेजान वस्तुयें हैं शायद

सबसे बेशकीमती वह सब कुछ

जो यह सब लोग हासिल करना चाहते हैं

मन मेरा भारी ही रहा

बोझिल ही रहा

दिल आंसुओं से भरा

जो मैंने चाहा वह मैंने

यहां आकर भी न पाया

लेकिन तभी एक बच्ची की

किलकारी ने मेरा ध्यान

अपनी ओर आकर्षित किया

यह मासूमियत ही है

किसी मासूम की जो मुझे

अभी भी जिन्दा रहने पर

मजबूर करती है

मेरे पांव उस आवाज को

जिसने मेरे मन में पल भर का सही पर

एक सुकून का अहसास भरा था को

तलाशने लगे और

मैं सोचने लगी कि

मैं क्यों होती जा रही हूं

दिन प्रतिदिन

इतनी कठोर एक पत्थर सी

क्यों नहीं बन जाती मैं फिर से

एक बच्चे सी  

पा लेती मासूमियत को और

लौट आती अपने बचपन में।