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चेहरा गुलाब सा: अंजली श्रीवास्तव द्वारा रचित कविता 

हजार मन्नतों के बाद, जब कुबूल हुई उनकी दुआ,
खुशियों की बरसात हुई, जिस दिन जन्म उसका हुआ,
खिल उठे माँ- बाप, देख उसका चेहरा गुलाब सा।
शनैः-शनैः बड़ी हुई, दिखाती कलाएं वह अनेक,
थी गुणों की खान वह, हर दिल अज़ीज़ और नेक,
नूर बरसाता था हर घड़ी, उसका चेहरा महताब सा।
एक दिन एक वहशी की, नापाक़ नज़र उस पर पड़ी,
नामंजूरी उस मासूम की, उस दरिन्दे की आँखों में गड़ी,
चल दिया फेंक कर, मुँह पर उसके, पानी कोई तेजाब सा।
चेहरा वह गुलाब सा, झुलस गया उस बेकसूर का,
कहीं निशान न बचा, उस नूरानी चेहरे के नूर का,
छुपा लिया मुँह उसने, डाल चेहरे पर एक हिजाब सा।
वक़्त बीतता गया और वह फिर मज़बूत होती गई,
टूटे ख़्वाबों के मोती, वह फ़िर से उम्मीदों में पिरोती गई,
अब दमक उठा था नूर से, उसका चेहरा आफ़ताब सा।
किया नहीं माफ़ उसने, उस वहशी दरिन्दे को कभी,
जब दिला दी भरपूर सजा उसको, चैन से बैठी तभी,
उस दिन फिर से खिल उठा, उसका चेहरा गुलाब सा।