in

कागज़ की कश्ती पर होकर सवार

कागज़ की कश्ती पर

होकर सवार

क्या मैं पहुंच पाऊंगी

आसमान के बादलों के

बर्फ से सफेद टुकड़ों के पार

तेरे पास

क्या मुझे देखकर

तू पहचान पायेगा मुझको

मुझसे डरकर

खुद में ही कहीं एक बिंदु सा

सिमटकर

बारिश की एक बूंद का दर्पण

बनकर

तू दूर कहीं भागकर

खो तो नहीं जायेगा

मेरी आंखों में धूल झोंककर

तेरा दिल तो कहीं से बदला हुआ नहीं

लगता पर

तेरा व्यवहार मेरे प्रति

परिवर्तित हो गया है

समय के बहते दरिया के साथ

मेरे जेहन में जो अतीत की कहानी

चल रही थी

वह वर्तमान में और

हर क्षण अपना रूप बदल रही है

रात को जो मेरी आंखें

पलकों को बंद करके सपने देखती हैं  

सुबह आंख खुलने पर वह

अधिकतर मुझे याद भी नहीं रहते

ऐसा महसूस होता है कि

जैसे वह मेरे अपने थे ही नहीं

मैंने उन्हें बीती रात देखा ही नहीं था

उनकी आहट को कहीं अपने भीतर

महसूस ही नहीं किया था

कागज़ हाथ में लिए थी

एक कश्ती अपने ही हाथों से

बनाई थी

उस पर अपनी जिंदगी की पूरी

कहानी लिखी थी

जो तुम्हारे चरणों को स्पर्श करके

तुम्हें समर्पित करना चाहती थी

जीते जी भी यह हो न सका

और अब जैसे तैसे

इस पूरी कायनात को

छानकर

कितनी मुश्किल से

तुम्हें तलाशा है

एक असंभव कार्य को संभव

कर दिखाया है लेकिन

फिर इस कहानी का

इस सपने का

इस यात्रा का

हमेशा के लिए अंत हुआ

तुम्हारी पलकों की चिलमन पर

एक बर्फ की मोटी परत का जामा चढ़ा

और तुम कहीं खो गये

मुझसे हमेशा के लिए बहुत दूर चले गये और

तुमने मुझे पहचानने से साफ साफ

इनकार किया।