एक साथ बह रही होती हैं
एक नदी की सारी लहरें लेकिन
कब कौन किसका साथ
एक पल में छोड़ देगी
यह उनको नहीं पता होता
हाथ कितना कसके थामा था
यहां तो कोई मेला या
उसकी भीड़ भी नहीं थी लेकिन
फिर भी हाथ की पकड़
न जाने कब ढीली पड़ गई और
देखा तो हाथ खाली रह गया
इस रिश्ते का सफर
खत्म हुआ
यह जो साथ था
बेमौका दगा दे गया
मंजिल अभी दूर थी
लेकिन इसके मुसाफिर को बीच रास्ते तन्हा छोड़ गया।
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