दर्द के दरिया को हंसते हुए पार करना है
दरिया के किनारे की सतह को ही नहीं
आसमान के चांद को भी
आहिस्ता आहिस्ता सही पर एक रोज
छूना है।
दर्द के दरिया को हंसते हुए पार करना है
दरिया के किनारे की सतह को ही नहीं
आसमान के चांद को भी
आहिस्ता आहिस्ता सही पर एक रोज
छूना है।
0 Comments