किस की कलम से लिखी गयी, इनकी ये तक़दीर
क्यों सज़ा ये काट रहे, न कोई दलील न तक़रीर
गर्दिश में हैं तारे इनके, बिंदास फिर भी जीते हैं
अपनी बेबसी को छुपाकर, वो मुस्कुराते भी हैं
दो वक़्त का पेट भर खाना, जब इनको मिल जाता है
वो दिन ख़ुशी के आँसू से, यूँ ही बीत जाता है
अथक परिश्रम करते, जुटे रहते हर काम में
थक के कच्ची ज़मीन पर, सो जाते विश्राम में
उनके बच्चों की मासूमियत भी, कुचली जाती बेरहमी से
अधनंगे बदन झुलसते हैं, तपती हुई गर्मी में
बारिश के मौसम में भी, कहाँ चैन आराम है
घर की छत टपकती ऐसी, रहना एक संग्राम है
त्योहारों के दिनों में, अधिक मेहनत वो करते हैं
परिवार के खुशियों की ख़ातिर, दिन रात वो खटते हैं
हर पल सीखते कठिन सबक़, जीवन को चलाने में
खून पसीने की कमाई, बह जाती इलाज कराने में
बिखरे अपने नसीब में, कभी ख़ुशियाँ भी तलाशते
मुफ़लिसी में जी कर भी, अपने आप को संभालते
होती हमारी तरक्की, उनके कठिन परिश्रम से ही
उनके बिना हमारे जीवन का सुख, संभव नहीं

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