पत्थर उठा रही है, पाहन सी हो गई है
कंचन सी कोमल काया,कुंदन सी हो गई है।।
किसका क़ुसूर किसने, मज़दूर है बनाया
मजबूर है नहीं पर, क्रंदन सी हो गई है।।
मेहनत समान करती,एवज़ में कम है पाती
असमानता की पीड़ा, चिंतन सी हो गई है।।
हक़ माँगती है अपना, तूफ़ान उठ है जाता
सागर सी शांत रहती, मंथन सी हो गई है।।
कैसी विडम्बना है,हैं दूरियाँ तो अब भी
ख़ुशियों से जैसे उसकी,अनबन सी हो गई है।।
जो हाथ हैं सजाते,महलों का आशियाना
ख़्वाबों के आशियाँ में, अंसुवन सी हो गई है।।
किलकारियों में लिपटा, है ‘उदार’
नन्हा वारिस
विष वृक्ष*की लता है, चंदन सी हो गई है।।
(*विष वृक्ष – समाज है )

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