तपिश: गरिमा सूदन द्वारा रचित कविता


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तपिश दिखती है सूर्य की एक झलक में,
महसूस होती है तपिश ग्रीष्म ऋतु के आगमन में।
मंजरियों के उगने में और लू के चलने में,
होती है तपिश दोपहर के हर पहलू में।
प्रतीत होती है तपिश मई-जून के महीनों में।
तपिश होती है रेगिस्तान की रेत में,
दिखती है तपिश किसानों द्वारा की गई कठिन मेहनत वाले खेतों में!
तपिश मैं अनुभव करती हूँ तुम्हारे हाथों में,
प्रतीत होती है तपिश तुम्हारी महत्वाकांक्षाओं में!
होती है तपिश हर मजदूर के ढ़ढ संकल्प में,
तपिश दिखती है सैनिकों के देशभक्ति जज़्बे में!
दिखती है तपिश पिता के अनगिनत बलिदानों में,
होती है तपिश माँ के निःस्वार्थ प्रेम और समर्पण में।
तपिश होती है मातृभूमि की गोद में!
तपिश दिखती है युवा पीढ़ी के जोश में,
होती है तपिश उनके नवीन विचारों और प्रगतिशील सोच में।


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