बेरहम फ़ासले: डॉ. मल्लिका त्रिपाठी द्वारा रचित कविता


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दिलों के बीच बढ़ते ये फ़ासले,
इंसान को इंसान से दूर ले जाते ये फ़ासले,
हक़ीक़त का आईना दिखाते ये फ़ासले।

कभी सोचा भी ना था कि ये फ़ासले इस कदर बढ़ जायेंगे,
कि हम चाहकर भी पास ना आ पायेंगे,
टूटेगा हमारा प्यार का घरौंदा
और हम सिर्फ़ तड़पकर देखते रह जायेंगे।

एक बार जो वक्त रेत की तरह हाथों से फिसलेगा,
उसे कोशिश करके भी ना पकड़ पायेंगे,
सड़क के किनारे खड़े सूखे दरख़्त की तरह,
इस बेदर्द ज़िंदगी में हम तनहा ही रह जायेंगे।

हम लाख गुज़ारिश करेंगे उनसे मिलने की,
पर बेमुरव्वत को कोई फ़र्क़ ही ना पड़ेगा,
हर गुजरते लम्हे के साथ ये फ़ासले और भी बढ़ते जायेंगे,
मौतें भी होंगी, रुदन भी होगा,
पर हम कफ़न पहनाने भी ना जा पायेंगे।

इन फ़ासलों का सफ़र तय करना, होगा बहुत मुश्किल,
बीच में अहम और वहम दोनों ही आ जायेंगे,
एक बार जो आए फ़ासले रिश्तों के दरमियाँ,
तो मेरी मौत से भी फिर, वो मिट ना पायेंगे।


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