सावन के झूले: ललिता वैतीश्वरन द्वारा रचित कविता


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आ गयी श्रावण की हरियाली, इत ,उत देखो हरा हरा
पड़ गए झूले, ऊँची पेंगे , धड़के जियरा ज़रा ज़रा
हृदय में उल्लास भरा हो, आनंद उमड़े छलक छलक
प्रियतम के आने से , उन्मादी मन में जागी प्रीत की महक
पार्वती सी मैं सज जाऊं , तुम आ जाओ मेरे शिव से
मुझे झुलाना धीरे धीरे, प्रणय हिंडोले बन हिय से
कभी बन कर कृष्ण तुम माखन चोर, मुझे रिझाना जैसे राधा
झूले में बैठ मैं लजाऊँ , न हो पाए कभी प्यार तुम्हारा आधा
मनमोहक हो गयी छटा, प्रकृति अब गयी निखर
बूंदो की हलकी फुहार में झूले पहुंचे परमानन्द शिखर
चमकीले हो कर जब छींटे चमक उठे हर तृण से
झूले हैं, मेला है फिर भी विरह से हूक उठी मन में
मेरा झूला खाली है , बैठ बैठ उस पर ललचाऊँ मैं
आ जाओ नीलकंठ से मेरे ,नेह डोर में लुभाऊं मैं
सावन का झूला ले कर गगन स्पर्शी पेंगे अनुराग की
मेरे हृदय के स्पंदन को देता आशा एक चिराग सी


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