अनजाने रास्ते: अनिल कुमार श्रीवास्तव द्वारा रचित कविता


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जमावड़े आज भी होते हैं गुलशन में
रसुख के अपने तमाशे आज भी होते हैं,
बस सफ़र में खामोशी बदस्तूर है साकी
अनजाने रास्ते हमसफ़र तमाम होते हैं।
मुलाकातों का सिलसिला भी जारी है
चौक पर मस्अले-मुसाइलों का दौर भी जारी है,
हर सफ़र एक कुर्बान-ए-नशीहत एक इल्म है
वह काफ़िर भी है तो ईमान अनजाने रास्तों का वारिस है।
यह समां बदल न जाए कहीं साकी
मैं नज़र से पी रहा हूँ और सफ़र गुमनाम है,
प्यार में उसके मदमस्त अपने मस्अले का हल ढ़ूंढ़ता हूँ
अनजाने रास्तों का हर कदम नज़र-ए-सलाम करता है ।
मौला दे भी दे सबकुछ फिर भी दामन खाली रहेगा
मुलाकातों का सिलसिला यह जारी यूंही रहेगा,
सफ़र खुशनुमा या फिर बदनुमा रब तेरा ख्याल अक्सर रहेगा
इस अनजाने सफ़र में एक तू मिल जाए रूह को आराम और दिल को सुकून रहेगा।

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