सपने: ऋषिका श्रीवास्तव द्वारा रचित कविता


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टूट जाते है सपने एक दिन..
नहीं होते है पूरे, तभी तो अधूरे होते है हर दिन..
बिखर जाती है आशाएं, मर जाता है विश्वास भी,,
जिंदा होते है हम मग़र, रह जाता है बस अधूरा एहसास ही..
दिन का उजाला “उम्मीद” तो रात का घना अँधेरा है “सपना”..
ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है मग़र कभी हक़ीक़त नहीं बन पाता है “सपना”..
पलकों में क़ैद होकर हर रात नए-नए ख़्वाब सजाता है…
सुबह को उजाला होते ही अपनी दुनिया में गुम हो जाता है..
सपना तो आख़िर सपना होता है ये कब किसी का अपना कहलाता है..
कभी आज़ाद परिंदे की तरह आसमान में उड़ता दिखाता है..
तो कभी नदियों की धार के साथ-साथ बहना,,..
कभी होंठो पे मुस्कान लाता है, तो कभी आँसू की नदियां बहाता है…
कभी दीपक सा जलकर अंधकार मिटाता है..
तो कभी अँधेरों में डूबाता ही जाता है..
हर एक दिन नई-नई दुनिया की सैर करवाता है..
सपना तो आख़िर सपना होता है कहाँ ज़िन्दगी का हिस्सा बन पाता है..!!

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