आजाद परिंदे: अनिल कुमार श्रीवास्तव द्वारा रचित कविता


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विस्तृत नभ अनहद अनुगामी लक्षित मंजिलों के निशां
दूर नहीं अब लक्ष्य मुस्तक़बिल निष्णात मस्त पंखों के बयां,
भर उल्लास उड़े नभ में कलरव करते नभचर हम
नील आकाश के परचम थामें उन्मुक्त आजाद परिंदे हम।

हम बेपर परवाज़ नहीं सपर उड़ते अंत स्वच्छंद
लेकर आशाओं को अपनी पंख फैलाए दूर अनंत,
हम क्यों थामें कनक कसोरे जब निज मान अभिमान आनंद
रंग बहुतेरे भरते परहित हम आजाद परिंदे सकल सानंद।

गान नव-ताल सुमंगल हर दिन जब ताने धरा नवल वितान
सुरज की किरणों से गर्वित कलरव लाती  नव-बिहान,
हम आजाद परिंदे सृजन सृष्टि के अतुल संवाहक
मधुर ध्वनि बन गुंजन अमृत निश-दिन करते उषा का गान

सहन थपेड़े बेफिक्र पवन के साथ संतुलन थामें हम
चूमें आवारा प्रभंजन अठखेलियाँ नित करते हम,
कर संधान अनवरत पथ पर नित-प्रति श्रद्धा दिखाते हम
गिरकर उच्च शिखर फिर थामें अनुशासित आजाद परिंदे हम।

मनुज तुम जानो मोल हर्ष का आजादी अपनी पहचान
पराधीन पराश्रित जीवन क्षणभंगुर सुख नैतिक-ज्ञान,
है अनमोल उपहार जीव का विचरण करे बेड़ियाँ तोड़
बनो आजाद परिंदे तुम भी गुंजे नित शंखनाद दिनमान।


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