कैसे मैं खेलूँ होली सखा बनवारी
राग-फाग और कहाँ बाजत मुरली प्यारी,
नित निर्गुण ब्रह्म अनंत उर उपजे
भए रंग अबीर असरारी।
खुशबु समग्र व्यग्र-व्यथित मन तरसाए,
केतकी, गुलाब, चंपा मस्त छटा प्यारी ,
निसर्ग धरा रंग आज विस्मित हो
राह देखूँ, तज तन-मन, आस कदंब डारी।
हस्त रक्त-वर्ण, अंग सुर्ख प्रीत प्यारी
रंग लाल देखो भरी कंचन पिचकारी,
मोहे धरा-रूप रंग गूंजे फाग न्यारी
तुम कहाँ छूपे हो कान्हा आई होली मतवारी।
भींगूं कान्हा तरबतर यह फाग अंग लागे
प्रीत-रीति अंग रंग प्रेम रस जागे,
हो चैतन्य तन-मन, छवि एकात्म अनंत भागे
उर आनंद हो रंग, मैं नाचूँ गिरधारी!
अबकी होली ना सताओ, आओ
खोल बंध सारे तन के रंग-अबीर डारो,
खेल प्रीत-रंग होली,फिरूँ मैं बावरी हो सतरी
उड़े गुलाल घटाटोप श्यामल बांकेबिहारी ।

0 Comments