श्रमिक जीवन: उमा नटराजन द्वारा रचित कविता


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अभिजात्य वर्ग के अधीन, वह श्रमिक है छटपटाता
पराधीनता की चरम सीमा पर, स्वतंत्रता के लिए तड़पता
लघु काया से रईसों की महामाया की सेवा में उलझता
उनकी भावशून्यता में सिसकता फिरता

मूक खग सा निरीह बन कर वह स्वयं की परिभाषा के लिए तरसता
सामाजिक तंत्र के मकड़ी जाल में सदैव पिसता रहता
कुकुरमुत्ते की तरह उभरते चंद समाज सेवियों के जाल में फंसता
संवेदनहीन कंटीले दंश को सहकर स्वेद कण बहाता

कोरे वादों के छलावे में अपनी निजता को भूलता
अमीरी से ले महामानव की तानाशाही में उलझता फिरता
अंतहीन चिरंतर यातना का भोक्ता श्रमिक है, हमारा भाग्य विधाता
कैसी विडम्बना है वह जीवन की धूल है चाटता रहता

आंधी के थपेड़ों से सामना कर अडिग बना रहता
फ़ौलादी हाथों को मजदूरी की आग में तपा कर स्वर्ण बना देता
आलीशान इमारतों के छतों को वह पसीना बहाकर बुनता रहता
खुद उसका ठिकाना, बिना अंबर के नग्न का नग्न रह जाता

खेतों में वह स्वयं बीज बोता दूसरों की थाली है सजाता
पेट पर गीली पट्टी बांध कर बामुश्किल दो कौर चबा लेता
नित्य श्रम से दिहाड़ी कर, चट्टानों की दरख्त सी उभरी एड़ियों की दरारों से रिसते लहु की परवाह न करता
शिलाओं को मोड़, भगीरथ नीर की जो शिरा मोड़ दे उस श्रेष्ठ श्रमिक के शक्ति श्रम को नमन

 


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