मन को हर्षाने सावन मास आया है,
संग अपने वर्षा की बहार लाया है।
जेठ मास में झुलसे वन और मन,
सूखी पड़ी थी तेरी मेरी छत संग डगर।
उनको फिर से हरा-भरा करने आया है,
जलमग्न, सुहाना, अद्भुत, रंगीन ये मौसम,
आज फिर त्योहारों के संग आया है।
मन मचलता मेरा सांझ सवेरे,
देख काले बादल संग लहराती डाली।
देख हसीन नजारों को,
वीणा मेरे मन की मल्हार गाती।
मोर सुर में गाकर नाच दिखाते,
तब मेघों की गर्जना मानो,
शिव का तांडव रूप दिखाते।
ताल, तलैया, नदी, सरोवर फिर से,
अपने अस्तित्व में आते।
ऊपर स्वच्छ नीला गगन,
नीचे निखरा हरा उपवन।
जादू है बादलों के संग वर्षा की फुहारों का,
मनोहारी चित्रण दिखलाने हर बरस आता।
जन-जीवन खुशियों से भरा रहे,
पैगाम वर्षा की बहारों का राग यही सुनाता।

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