मग़रूर नहीं मजदूर हूँ, मैं थकान से चूर हूँ,
सिर पर बोझा, मन से व्याकुल, फिर भी जीने को मजबूर हूँ ।
बच्चे मेरे भूखे प्यासे, सौभाग्य सदा मुझसे है भागे,
श्रम की बूंदे मेरी किस्मत, यही बचाती मेरी इज़्ज़त।
ना मेरा कोई ठौर ठिकाना, हर पल मुझको चलते जाना,
रोती आँखें, हँसता चेहरा, बस मेरा है यही तराना।
खुला आसमान मुझे है भाता, मुझको पढ़ना लिखना ना आता,
अपने परिवार के पालन हेतु, दुनियाँ में मैं कहीं भी जाता।
लहू मेरा पानी सा बिकता, परिश्रम के आगे दुर्भाग्य ना टिकता,
टूटी खटिया, फूटी छत है, बूँद बूँद पानी है रिसता।
कर्मठ हूँ बेईमान नहीं मैं, जीवन मेरा आसान नहीं है,
सूखी रोटी-प्याज़ बाँध के, सोऊँ जहाँ मैं, मकान वही है।
दुत्कार सही है, मार सही है, मैंने समय की धार सही है,
जब जब मैंने मरना चाहा, अश्रु की सिर्फ़ धार बही है ।
गर्मी की तपिश, बारिश का पानी, सदा सुनाते सब मेरी कहानी,
छल प्रपंच से दूर मैं रहता, बस मेरी है यही नादानी।
इस फ़रेबी संसार में, नेकनीयती की मैं आवाज़ हूँ,
कामगार हूँ, जाँबाज़ हूँ, अपनी दुनियाँ का सरताज हूँ।

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