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बहारों के दिन: मनीषा अमोल द्वारा रचित कविता

चमन के चेहरे पर आया है गुलाबी निखार
मानो कुदरत ने स्वयं किया उनका श्रृंगार
बिखर रही हवाओं में ख़ुशबुओं का अंबार
लेकर हुस्न की शोख़ी जो आयी है बहार

बहारों के दिन, दिलाती याद वो पलछिन
कभी थे हम करीब, हर वक़्त रात दिन
मेरे प्यार की परछाईं, है सूनी तुम बिन
गुज़र रही है ज़िंदगी, हर लम्हा गिन गिन

तुम्हारी नज़रों की, ऐसी कशिश मदमाती
बिना किसी डोर, मैं खिचीं चली आती
उनकी निगहबानी, आज भी महसूसती
वो सुनहरे पल, जिसे आज मैं हूँ कोसती

खिलते बहारों में फूल, तितलियाँ मंडराती
उनकी रंगीनियाँ, तनिक अब न भाती
यूँ हवा में बिखर गए, गहरे रिश्ते की पाती
मेरे ख्वाबों के करीब, गहरी धुंध छा जाती

क्यूँकर आए थे जीवन में, सोचती हूँ मैं
बेमानी रिश्ते की गरमाहट, झुलसती हूँ मैं
इन ख़ुशनुमा पलों में, उदासीन हूँ मैं
मेरे जीवन में भी आए बहार, तरसती हूँ मैं