पहली बारिश: वर्षा सरन द्वारा रचित कविता


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जेठ की दुपहरी में पसीने से लतपथ कृषक
करता है प्रतीक्षा आषाढ़ की , धूप में खड़ा हो बेसबर
मानसून की पहली बारिश को ताक़ता है मेघ घिरा गगन
झूमता है खुशी से जब आते हैं बदरा सघन
फिर पड़ती हैं रेशमी सी बूँदे लेतीं उसके कर्मठ हाथों का चुम्बन
भागता है घर को लिए एक आस औ नई उमंग
पहली बारिश से झूम उठते उसके घर के हर जन
उठती है मिटटी से सोंधी सोंधी खुशबू निरंतर
मेरे घर भी पहली बारिश लाती नया उत्सव
धुल जाते सारे बाग बगीचे और गाते  गीत हो पंछी मगन,
निर्झर गिरती बारिश को देखती हूँ जब भी
उसके जीवन आनन्द और सौंदर्य में खो जाती हूँ
वो कहते हैं कि कहाँ  खो गयीं, पहली बारिश के आकस्मिक प्रवास से
मैं कहती हूँ जी कुछ नहीं पहली बारिश तो नव अतिथि है लाता पावन सावन और उल्लास
तुम हो न हो अब अधिक अधीर झट लायी मैं पकौड़े और चाय गर्मागर्म।

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