पंचतत्व से बनी मैं… शक्ति: राधा शैलेन्द्र द्वारा रचित कविता


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पंचतत्व से बनी मैं खुद में समेटे हुए हूँ
जल,अग्नि,वायु,पृथ्वी,आकाश..हाँ मैं शक्ति हूँ!
मैं नारी हूँ,मैं संघर्ष हूँ
कला हूँ मैं, मैं ही हूँ संकल्प,साक्षी भी,प्यार भी मैं
मैं शक्ति हूँ, भक्ति भी हूँ,मैं ही हूँ आस्था भी!

व्यवस्था की नींव हूँ मैं,भ्रांति और क्रांति भी मैं ही हूँ
धैर्य हूँ मैं,मैं ही हूँ अग्नि और मोम भी हूँ मैं ही
मैं हूँ धरा,कल्पना भी हूँ मैं ही,
मैं ही ‘सत्य’ भी हूँ,मैं हीं आदि हूँ

अंत का निष्कर्ष भी हूँ मैं ही!
मैं ही हूँ सृष्टि की परम् उपलब्धि;
जाने क्या क्या..और..क्या नहीं हूँ मैं
किन्तु फिर भी विडंबना यह है कि

जन्मदात्री धात्री होकर भीअपने परिचय
अपने अस्तित्व की,तलाश में व्याकुल हूँ मैं!
सबकी “मुक्ति” का मार्ग प्रशस्त करने वाली,

पुनः पुनःप्रकृति को विन्यस्त करने वाली मैं हूँ;
अपनी अस्मिता की संरक्षा के लिए
भीता सीता सीअंततः एक नारी बेचारी
फिर विलीन हो जाऊँगी इसी पंचतत्व में!


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