दिल्लगी अरमानों से: दीप्ति श्रीवास्तव द्वारा रचित रचना


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बढ़ते हुए दरख़्तों से, ऊंचे होते जाते अरमान,
ज़मीनी हकीकतों से वे, हो बेख़बर अनजान।
बावला मन बेख़ौफ भरे ऊंची उड़ान,
तल्ख़ ख्व़ाहिशों से बंध, था वो नादान।

बेतकल्लुफ़ से जो दस्तक दे जाते थे ख्वाब,
तरुणाई की सर्द रातें, करते नींदें गुलज़ार।
बंद पलकों में होती दिलकश बातें तमाम,
चंद ख्वाबों के शोख़ लम्हे, थे अरमानों का इज़हार।

पता आशियाने का मेरे भूले बैठे वो ख्वाब,
अरसे से हुए ना रूबरू, ना उनके दीदार।
मिलीं उम्मीदें कुछ सलामत सी, ख्वाहिशों की राज़दार, बुलंद जज़्बा परिंदों सा, नापें ज़मीं आसमां।

तमन्नाएं मुस्तकिल सी खड़ीं, कभी थीं जो गुमनाम, नेक दिली इरादों में लिए, था हौसलों में ईमान।
फ़ासले ज़मीं से आंकती, वो मंज़िलों के पार , हक़ीक़त से हो रूबरू, ना थी अब गुमराह।

फ़िक्र छोड़ मुद्दतों की, कर दीवानगी पर ऐतबार,
फ़तेह हुईं बुलंदियां, खिलखिलाए अरमान।
बाकी रही ना कोई चाहतें, ना कयास दिन रात,
जुनूनी तमन्नाओं ने, भर ली जो बेफ़िक्र उड़ान।

अरमानों की महफिल सजी, रुखसार से वो ख़्वाब, सराबोर हो गर्मजोशी में, बह गए थे जज़्बात।
बेहिसाहब मिली शोहरतें, हर दिल से मुबारकबाद, मंज़र वो देख कामयाबी का, कायनात भी मेहरबान।

 


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