तपिश: हरेन्द्र नारायण सिंह द्वारा रचित कविता


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धूप की चादर तनी है नभ में,
जैसे आग बिखरी हो सब में।
धरती जलती, पत्ते रोते,
प्यासे हैं सब, बादल सोते।

तपती राहें, छाँव न कोई,
हवा भी गर्म, चैन न होई।
ताल तलैया सूखे सारे,
जैसे छूटे हों सपने प्यारे।

घरों की दीवारें तमतमाईं,
नींदें भी अब दूर उड़ाईं।
पसीने से भीगे माथे,
मन करता जाए कुछ राहत के।

प्रकृति माँ से प्रार्थना करें,
बरसे मेघ, जीवन सवरे।
तपिश में भी हो धीरज, आस,
हर जलन के बाद मिले प्रकाश।


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